आज कोल्हापुरी गेट में कोई बेरोज़गार नहीं है। वहाँ अब "हैंडलूम म्यूज़ियम" है - बाबूराम के पुराने करघे के साथ। और साथ में एक मॉडर्न ट्रेनिंग सेंटर, जहाँ बूढ़े बुनकर जवानों को नई टेक्नोलॉजी सिखाते हैं।
लेकिन बाजार ने आत्मा की कीमत नहीं चुकाई। उसने मशीन से बना सस्ता कपड़ा खरीदना शुरू कर दिया। एक-एक करके सारी दुकानें बंद हुईं। करघे बेचे गए। बाबूराम ने हाथ बढ़ाकर कहा, "मुझे काम दो। मैं बुन सकता हूँ।"
यह कहानी है एक छोटे से कस्बे "कोल्हापुरी गेट" की, जो कभी हथकरघा बुनकरों के लिए मशहूर था। यहाँ के लगभग हर घर में करघा था। बाबूराम अपने पिता और दादा की तरह बुनकर था। उसके हाथ रंगों और रेशम के धागों से जादू कर देते थे। structural unemployment in hindi
लेकिन उसकी बेटी सीता ने कहा, "पापा, तुमने धागे-धागे से फूल बुनना सीखा। ये मशीन तो बटन दबाने भर की चीज़ है।"
बाबूराम अक्सर कहता, "हुनर मरता नहीं, बस थोड़ा सा नया रूप ले लेता है। बस उसे पहचानना आता होना चाहिए।" "हुनर मरता नहीं
एक साल बाद, वही कंपनी जिसने उसे नौकरी से ठुकराया था, अब उसे "टेक्निकल सुपरवाइजर" के पद पर ले गई। बाबूराम अब पुराने बुनकरों को नई मशीनें सिखाता।
बाबूराम ने सीखना शुरू किया। उसकी उँगलियाँ, जो कभी रेशम संवारती थीं, अब कीबोर्ड पर चलने लगीं। उसने सीखा कि ऑटो-लूम को कैसे सेट करना है, कैसे डिज़ाइन अपलोड करने हैं। structural unemployment in hindi
कहानी का सीख: